ज्योतिष के अनुसार केतु ग्रह
केतु ग्रह एक छाया ग्रह है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, केतु को अध्यात्म, वैराग्य, मोक्ष, तांत्रिक आदि का कारक माना गया है। साथ ही यह ग्रह तर्क, बुद्धि, ज्ञान, वैराग्य, कल्पना, अंतर्दृष्टि, मर्मज्ञता, विक्षोभ और अन्य मानसिक गुणों का कारक है। केतु को किसी भी राशि का स्वामित्व नहीं मिला है, लेकिन धनु राशि में केतु की उच्च राशि है, जबकि मिथुन राशि में यह नीच भाव में होता है। केतु भावना भौतिकीकरण के शोधन के आध्यात्मिक प्रक्रिया का प्रतीक है और हानिकर और लाभदायक, दोनों ही प्रकार से माना जाता है, क्योंकि ये जहां एक ओर दुःख एवं हानि देता है, वहीं दूसरी ओर एक व्यक्ति को देवता तक बना सकता है। केतु ग्रह 12 भावों में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही तरह से प्रभाव देता है।
केतु ग्रह के सकारात्मक प्रभाव
केतू ग्रह के सकारात्मक प्रभाव से जातक चरित्रवान बनता है। जातक के मामा, पुत्र, एवं पोते के साथ संबंध मधुर बने रहते हैं। जातक अपने आध्यात्मिक ज्ञान को बढ़ता है। जातक को पैतृक सम्पत्ति मिलती है। जातक खूब यात्राएं करेगा और यात्राओं से लाभ मिलेगा। केतू ग्रह के सकारात्मक प्रभाव संतान के लिए अच्छे परिणाम देता है। जातक एक अच्छा सलाहकार होता है। ऐसा जातक आज्ञाकारी और भाग्यशाली होता है। जातक का धन बढता है। जातक अपने प्रयासों से धनार्जन करता है। केतू जातक के पैरों को मजबूत बनाता है। जातक को पैरों से संबंधित कोई रोग नहीं होता है।
केतु ग्रह के नकारात्मक प्रभाव
केतू ग्रह के नकारात्मक प्रभाव कारण जातक अक्सर बीमार रहता है, बेकार के वादे करता है और तैतीस साल की अवस्था तक शत्रुओं से पीडित रहता है। वैवाहिक सुख कम मिलता है। दुष्टों की संगति मिलती है। मित्रों से भी कष्ट मिलता है। उसे बच्चों से सम्बंधित गंभीर समस्याएं रहती हैं। ऐसा जातक किसी भी बात के लिए न नहीं कहता इसलिए वह हमेशा परेशान रहता है। जातक किसी कार्य के लिए जो निर्णय लेता है तो उसमें उसे असफलता का सामना करना पड़ता है। जातक एक जगह पर आराम नहीं कर सकेगा और वह जगह-जगह भटकता रहेगा। जातक को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जातक के सामने अचानक कोई न कोई बाधा आ जाती है। केतु से प्रभावित जातक अक्सर डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं। भय लगना, बुरे सपने आना, शंकालु वृत्ति हो जाना भी केतु के ही कारण होता है। साथ ही केतु अशुभ होने पर व्यक्ति तंत्र मंत्र जादू टोने टोटके आदि में विश्वास करने लगता है ढोंगीयों के चक्कर में पड़ करके अपना नुकसान करने लगता है, इस कारण पड़ोसियों से व पारिवारिक जनों से संबंध खराब होने लगते हैं, जातक तंबाकू, शराब, मांस आदि का सेवन करने का भी हो जाता है तथा हमेशा अपनी बातों को पूरा ना करना और धोखा देना व अपने ही किए हुए वादों में फस जाना भी खराब केतु की नकारात्मक स्थिति है।
केतु ग्रह की शांति के टोटके/उपाय
(1) केसर का तिलक लगाएं।
(2) कान में सोना पहनें।
(3) व्यर्थ का सफर न करें।
(4) भगवान गणेश की पूजा करें।
(5) काले कुत्ते को प्रतिदिन रोटी खिलाते रहें।
(6) मकान का प्रवेश द्वार दक्षिण में न रखें।
(7) घर में सोने का एक आयताकार टुकड़ा रखें।
(8) शराब और मांसाहारी भोजन से स्वयं को बचाएं।
(9) मजदूर, अपाहिज व्यक्ति की यथासंभव मदद करें।
(10) नास्तिक और नास्तिकता के विचारों से दूर रहें।
(11) लहसुनिया पहनने से भी केतु के अशुभ प्रभाव में कमी आती है।
(12) पिता और पुत्र का कभी अनादर ना करें। बड़ों का सम्मान करें
(12) किसी भी मंदिर की चोटी पर झंडा अवश्य लगाएं
केतु की वस्तुओं का दान
केतु का दान वाली वस्तुओं में तिल, कंबल, कस्तूरी, चाकू, लोहा, छतरी, लहसुनिया, सीसा, रागा, बकरा, काला कपड़ा आदि वस्तुओं है। यह दान प्रत्येक मंगल, बुधवार को सूर्यास्त के बाद किया जा सकता है।
नोट-: किसी भी ग्रह का दान करने से पहले किसी अच्छे ज्योतिषी से अपनी कुंडली का विश्लेषण करा लेने के बाद ही दान करना चाहिए क्योंकि कुंडली में बैठे ग्रहों के आधार पर ही जान सकते हैं की किस ग्रह का दान करना चाहिए और किस ग्रह का दान नहीं करना चाहिए।
केतु के मंत्र व रत्न व मंत्र जाप संख्या
केतु का रत्न -: लहसुनिया
(Cats Eye) ॥
केतु गायत्री मंत्र -: ॐ पद्म पुत्राय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो केतु प्रचोदयात्॥
केतु मंत्र जाप संख्या -: 17 हजार मंत्र जाप ॥
केतु का तांत्रोक्त मंत्र-: ॐ स्रां स्रीं स्रों स: केतवे नम:॥
केतु का वैदिक मंत्र-: ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे। समुषद्भिरजायथा: ॥
केतु का पौराणिक मंत्र-: ॐ पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम्। रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम्॥
केतु देव की सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने के लिए तथा नकारात्मक उर्जा को कम करने के लिए उपरोक्त उपाय के साथ-साथ केतु कवचं, केतु स्तोत्र पढ़ सकते हैं, साथ ही केतु देव की आरती भी कर सकते हैं।
॥केतु स्तोत्र॥
केतु: काल: कलयिता धूम्रकेतुर्विवर्णक:। लोककेतुर्महाकेतु: सर्वकेतुर्भयप्रद: II1II
रौद्रो रूद्रप्रियो रूद्र: क्रूरकर्मा सुगन्ध्रक्। फलाशधूमसंकाशश्चित्रयज्ञोपवीतधृक् II2II
तारागणविमर्दो च जैमिनेयो ग्रहाधिप:। पंचविंशति नामानि केतुर्य: सततं पठेत् II3II
तस्य नश्यंति बाधाश्चसर्वा: केतुप्रसादत:। धनधान्यपशूनां च भवेद् व्रद्विर्नसंशय: II4II
II केतुकवचम् II
॥अथ केतुकवचम्॥
अस्य श्रीकेतुकवचस्तोत्रमंत्रस्य
त्र्यंबक ऋषिः I
अनुष्टप् छन्दः, केतुर्देवता, कं बीजं I नमः शक्तिः I
केतुरिति कीलकम् I केतुप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः II
केतु करालवदनं चित्रवर्णं किरीटिनम् I
प्रणमामि सदा केतुं ध्वजाकारं ग्रहेश्वरम् II1II
चित्रवर्णः शिरः पातु भालं धूम्रसमद्युतिः I
पातु नेत्रे पिंगलाक्षः श्रुती मे रक्तलोचनः II2II
घ्राणं पातु सुवर्णाभश्चिबुकं सिंहिकासुतः I
पातु कंठं च मे केतुः स्कंधौ पातु ग्रहाधिपः II3II
हस्तौ पातु श्रेष्ठः कुक्षिं पातु महाग्रहः I
सिंहासनः कटिं पातु मध्यं पातु महासुरः II4II
ऊरुं पातु महाशीर्षो जानुनी मेSतिकोपनः I
पातु पादौ च मे क्रूरः सर्वाङ्गं नरपिंगलः II5II
य इदं कवचं दिव्यं सर्वरोगविनाशनम् I
सर्वशत्रुविनाशं च धारणाद्विजयि भवेत् II6II
II इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे केतुकवचं संपूर्णं II
॥ श्री केतु देव की आरती ॥
आरती करे केतु देव तुम्हारी, आरती करे केतु देव तुम्हारी
सुनलो प्रभु विनय हमारी , सुनलो प्रभु विनय हमारी
जय श्री केतु कठिन दुख हारी, करहु सुजन हित मंगल कारी
ध्वज युक्त रुण्द रूप निराला, घोर रौद्रतन अघमन काला
शिखि तारिका ग्रह बलवाना, महा प्रताप न तेज ठिकाना
वाहन मीन महा शुभ कारी, दीजै शान्ति दया उर धारी
आरती करे केतु देव तुम्हारी, आरती करे केतु देव तुम्हारी