ज्योतिष के अनुसार राहु ग्रह
ज्योतिष में राहु ग्रह को एक पापी ग्रह माना जाता है। वैदिक ज्योतिष में राहु ग्रह को कठोर वाणी, जुआ, यात्राएं, चोरी, दुष्ट कर्म, त्वचा के रोग, धार्मिक यात्राएं आदि का कारक कहते हैं। 27 नक्षत्रों में राहु आद्रा, स्वाति और शतभिषा नक्षत्रों का स्वामी है। राहु मिथुन राशि में उच्च तथा धनु राशि में नीच होता है। ज्योतिष के अनुसार, राहु एक छाया ग्रह है जिसकी अपनी कोई राशि नहीं है। इसलिए राहु को प्रतिदिन पूरे दिन में एक ऐसा समय दिया है जिसे राहु काल कहा जाता है। यह अवधि लगभग डेढ़ घण्टे की होती है अतः वार के अनुसार के इसकी अवधि अलग अलग है। अतः राहु जिस राशि में होता है, उस राशि का प्रतिनिधित्व करता है तथा जिस ग्रह से प्रभावित हो यह उस ग्रह की पूरी शक्ति समाप्त कर देता है। उस ग्रह और भाव की शक्ति खुद ले लेता है। यह उस भाव से सम्बन्धित फ़लों को दिलवाने के पहले राहु बहुत ही संघर्ष करवाता है फ़िर सफ़लता देता है।
राहु ग्रह के सकारात्मक प्रभाव
राहु ग्रह के सकारात्मक प्रभाव के कारण व्यक्ति के मस्तिष्क में शुभ विचार उत्पन्न होते हैं जिससे वह अच्छे कार्यों को अंजाम देता है। जातक अपनी बुद्धि को सही दिशा में लगाएगा और ऊँचाइयों को प्राप्त करेगा । राहु के सकारात्मक प्रभाव से व्यक्ति कभी भी कर्जदार नहीं रहेगा। वह अपने पीछे सम्पत्ति छोड जाएगा। जातक सभी प्रकार की झंझटों या मुसीबतों के मुक्त होगा। जातक साहसिक कार्यों से पीछे नहीं हटता है। जीवन में जोखिम लेते रहा है, जातक समाज में प्रभावी व प्रतिष्ठावान बनता है। जातक कपड़ों पर पैसा खर्च करेगा । पूर्ण सुख सुविधा जातक को प्राप्त होती रहती है। शत्रु निरंतर जातक विरूद्ध षड्यंत्र करते ही रहते हैं, लेकिन सफल नहीं होते हैं
राहु ग्रह के नकारात्मक प्रभाव
राहु ग्रह के नकारात्मक प्रभाव के कारण उसे कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ये समस्याएँ मानसिक और शारीरिक रूप से भी हो सकती हैं। राहु के कारण हिचकी, पागलपन, आँतों की समस्या, अल्सर, गैस्ट्रिक आदि की समस्याएँ जन्म लेती हैं। जातक का मस्तिष्क अस्थिर रहता है तथा मानसिक परेशानियां दिन प्रतिदिन बढ़ती रहती हैं। जातक अपने बारे में चिन्ता करने वाला और अवसरवादी होता है। जातक का घरेलू जीवन चिंताओं और परेशानियों से भरा होता है। जातक कितनी भी मेहनत कर लें उसके खर्चे आमदनी से अधिक ही रहेंगे। जातक झूठे आरोप भी लगते हैं । जातक आत्महत्या की चरमसीमा तक जा सकता है। जातक अदालती मामलों में बेकार में पैसे खर्च करता है
राहु ग्रह की शांति के टोटके/उपाय
(1) बहते पानी में सुरमा बहाएं।
(2) नदी में नारियल प्रवाहित करें ।
(3) काले कुत्ते को रोटी अवश्य दें।
(4) काले व नीले रंग से परहेज करें।
(5) रसोई में बैठकर ही भोजन करें।
(6) किसी से झगड़ा न करें।
(7) भाइयों / बहनों को कभी नुकसान न पहुंचाएं।
(8) जौ में दूध मिलाए और बहते पानी में बहाएं।
(9) बहते हुए पानी में राहु की वस्तुओं को बहाएँ।
(10) पानी पीने के लिए चांदी का गिलास का प्रयोग करें।
(11) सरस्वती माता की पुजा करें। धर्म-कर्म के कामों में रुचि रखें ।
(12) धोखे और फरेब से बचें। किसी को उधार न दें। अतिरिक्त हौसले का प्रदर्शन न करें
(13) अंधे लोगों का सहारा बनें मांस-मछली एवं शराब इत्यादि मादक पदार्थों का सेवन न करें ।
राहु की वस्तुओं का दान
राहु का दान वाली वस्तुओं में नीले फूल, कच्चा कोयला , सूखे नारियल, उड़द, मूली, गोमेद, तेल, लोहा, रत्न, अभ्रक, नीला कपड़ा। आदि वस्तुओं है। यह दान प्रत्येक शनिवार की को शाम किया जा सकता ।
नोट-: किसी भी ग्रह का दान करने से पहले किसी अच्छे ज्योतिषी से अपनी कुंडली का विश्लेषणकरा लेने के बाद ही दान करना चाहिए क्योंकि कुंडली में बैठे ग्रहों के आधार पर ही जान सकतेहैं की किस ग्रह का दान करना चाहिए और किस ग्रह का दान नहीं करना चाहिए।
राहु के मंत्र व रत्न
राहु का रत्न -: गोमेद (Hessonite)
राहु गायत्री मंत्र -: ॐ शिरो रूपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो राहुः प्रचोदयात्॥
राहु मंत्र जाप संख्या -: 18 हजार मंत्र जाप ॥
राहु का तांत्रोक्त मंत्र -: ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः॥
राहु का वैदिक मंत्र -: ॐ कयानश्चित्र आभुवदूतीसदा वृध: सखा . कयाशश्चिष्ठया वृता ॥
राहु का पौराणिक मंत्र -: ॐ अर्धकायं महावीर्य चंद्रादित्य विमर्दनम्. सिंहिका गर्भ संभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्॥
राहु देव की सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने के लिए तथा नकारात्मक उर्जा को कम करने के लिए उपरोक्त उपाय के साथ-साथ राहु कवचं, राहु स्तोत्र पढ़ सकते हैं, साथ ही राहु देव की आरती भी कर सकते हैं।
II राहु कवच II
अस्य श्रीराहुकवचस्तोत्रमंत्रस्य
चंद्रमा ऋषिः I
अनुष्टुप छन्दः , रां बीजं I नमः शक्तिः I
स्वाहा कीलकम् ,राहुप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः II
प्रणमामि सदा राहुं शूर्पाकारं किरीटिन् II
सैन्हिकेयं करालास्यं लोकानाम भयप्रदम् II 1 II
निलांबरः शिरः पातु ललाटं लोकवन्दितः I
चक्षुषी पातु मे राहुः श्रोत्रे त्वर्धशरीरवान् II 2 II
नासिकां मे धूम्रवर्णः शूलपाणिर्मुखं मम I
जिव्हां मे सिंहिकासूनुः कंठं मे कठिनांघ्रीकः II 3 II
भुजङ्गेशो भुजौ पातु निलमाल्याम्बरः करौ I
पातु वक्षःस्थलं मंत्री पातु कुक्षिं विधुंतुदः II 4 II
कटिं मे विकटः पातु ऊरु मे सुरपूजितः I
स्वर्भानुर्जानुनी पातु जंघे मे पातु जाड्यहा II 5 II
गुल्फ़ौ ग्रहपतिः पातु पादौ मे भीषणाकृतिः I
सर्वाणि अंगानि मे पातु निलश्चंदनभूषण: II 6 II
राहोरिदं कवचमृद्धिदवस्तुदं यो I
भक्ता पठत्यनुदिनं नियतः शुचिः सन् I
प्राप्नोति कीर्तिमतुलां श्रियमृद्धिमायु
रारोग्यमात्मविजयं च हि तत्प्रसादात् II 7II
II इति राहुकवचं संपूर्णं II
राहु स्तोत्रम्
अस्य श्रीराहुस्तोत्रस्य वामदेव ऋषिः, गायत्री छन्दः।
राहुर्देवता, राहुप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ॥
राहुर्दानव मन्त्री च सिंहिकाचित्तनन्दनः ।
अर्धकायः सदाक्रोधी चन्द्रादित्यविमर्दनः ॥1॥
रौद्रो रुद्रप्रियो दैत्यः स्वर्भानुर्भानुमीतिदः ।
ग्रहराजः सुधापायी राकातिथ्यभिलाषुकः ॥2॥
कालदृष्टिः कालरुपः श्रीकष्ठह्रदयाश्रयः ।
विधुंतुदः सैंहिकेयो घोररुपो महाबलः ॥3॥
ग्रहपीडाकरो द्रंष्टी रक्तनेत्रो महोदरः ।
पञ्चविंशति नामानि स्मृत्वा राहुं सदा नरः ॥4॥
यः पठेन्महती पीडा तस्य नश्यति केवलम् ।
विरोग्यं पुत्रमतुलां श्रियं धान्यं पशूंस्तथा ॥5॥
ददाति राहुस्तस्मै यः पठते स्तोत्रमुत्तमम् ।
सततं पठते यस्तु जीवेद्वर्षशतं नरः ॥6॥
इति श्रीस्कन्दपुराणे राहुस्तोत्रं संपूर्णम् ॥
॥ श्री राहु देव की आरती ॥
आरती करे राहु देव तुम्हारी आरती करे राहु देव तुम्हारी
प्रेम विनय से तुमको जो पू पूजे, सूखे संपति उसको दीजे
महाशक्तिशाली सर्प अर्धकाया तेरा रूप विशाला पाया
जय जय राहु गगन प्रविसइया, तुमही चन्द्र आदित्य ग्रसइया ।
रवि शशि अरि स्वर्भानु धारा, शिखी आदि बहु नाम तुम्हारा ।
सैहिंकेय तुम निशाचर राजा, अर्धकाय जग राखहु लाजा ।
यदि ग्रह समय पाय हिं आवहु, सदा शान्ति और सुख उपजावहु ।
आरती करे राहु देव तुम्हारी आरती करे राहु देव तुम्हारी।