शनि ग्रह के सकारात्मक व नकारात्मक प्रभाव

 
ज्योतिष के अनुसार शनि ग्रह

शनि को सूर्य का पुत्र माना जाता है। पुराणों के अनुसार शनि के सिर पर स्वर्ण मुकुट, गले में माला तथा शरीर पर नीले रंग के वस्त्र और शरीर भी इंद्रनीलमणि के समान है। इनके हाथों में धनुष, बाण, त्रिशूल रहते हैं। शनि ग्रह तुला में उच्च, मेष में नीच के, तमोगुणी अग्नितत्व वाले तथा पश्चिम दिशा के स्वामी है।  शनि देव को कलियुग का न्यायाधीश कहा जाता है। शनि परम दण्डाधिकारी हैं और मनुष्य को उसके पाप और बुरे कार्यों के अनुसार दंडित करते हैं। शनि को क्रूर ग्रह माना जाता है। शनि देव को लोग परेशान करने वाला ग्रह मानते हैं। परंतु शनि को लेकर बनी हुई कई धारणाएं गलत हैं। क्योंकि शनि देव न्याय के देव भी कहे जाते हैं। यानी की ये अकारण किसी को भी परेशान नहीं करते हैं। जातक के कर्म ही उसके की दिशा को निर्धारित करता है। शनि ग्रह 12 भावों में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही तरह से प्रभाव देता है।  

शनि ग्रह के सकारात्मक प्रभाव    

शनि ग्रह के सकारात्मक के प्रभाव के कारण जातक लोक कल्याण के लिए सदा तत्पर रहता है। जातक राजनेता या अधिकारी बन सकता है। शनि से जुड़े व्यवसाय जैसे मशीनरी और लोहे का काम बहुत लाभदायक होगा। जातक अमीर और समृद्ध होगा और लंबी आयु के साथ अच्छे स्वास्थ्य का आनंद लेगा। जातक महत्वाकांक्षी होगा और सरकार से लाभ का आनंद लेगा। जीवन के हर क्षेत्र में उसे सफलता मिलती है और सुखों की कमी नहीं रहती। साथ ही ऐसा व्यक्ति एक के बाद एक कई मकान बनाता है या बना हुआ खरीद लेता है। शनि के कृपा  से जातक अपने कार्यक्षेत्र में सफलता की प्राप्ति करता है। शनि के प्रभाव के कारण जातक कर्मठ, कर्मशील और न्यायप्रिय बनाता है।

शनि ग्रह के नकारात्मक प्रभाव   

शनि ग्रह के नकारात्मक प्रभाव के कारण मन बुराई की ओर, कुसंगति, नशे की ओर झुकने लगता है। कोई भी कार्य करने की इच्छा नहीं होती, हमेशा आलस्य औरं तनाव बना रहता है। जवानी में ही बुढ़ापे के रोग होने लगते हैं, जोड़ों के दर्द होने लगते हैं शिक्षा, सन्तान, परिवार, व्यापार, आर्थिक स्थिति भी बिगाड़ती है, मानसिक सुख और पारिवारिक जीवन मे अशांति रहती है। मकान बनाने में या खरीदने में बार बार रुकावटे आती है, शनि ग्रह जातकों के लिए दुर्घटना और न्यायिक परेशानियां पैदा करता है। जातक को जेल तक जाने की नौबत जाती है।

शनि ग्रह की शांति के टोटके/उपाय 

(1) हनुमान चालीसा पढ़ें।

(2) छाया दान करें।

(3) काले कुत्ते को रोटी अवश्य दें।

(4) काले नीले रंग से परहेज करें।

(5) पिता और पुत्र का कभी अनादर ना करें।

(6) नास्तिक और नास्तिकता के विचारों से दूर रहें।

(7) शराब और मांसाहारी भोजन से स्वयं को बचाएं।

(8) तिल, उड़द, लोहा, तेल, काला वस्त्र और जूता दान देना चाहिए।

(9) अंधे, अपंगों, सेवकों और सफाइकर्मियों को खुश रखें और उन्हें दान दें।

(10) शनिवार के दिन किसी गरीब या बुजुर्ग व्यक्ति को काला कंबल दान करें।

(11) 800 ग्राम साबुत उड़द पर सरसों का तेल लगा कर बहते हुए जल में प्रवाहित करें।

(12) शहद का सेवन करें, शहद में काले तिल मिलाकर मंदिर में दान करें या शहद को घर में हमेशा रखें।

(13) शनि के मंदे कार्य अर्थात जुआ, सट्टा, शराब, वेश्या से संपर्क और ब्याज का धंधा आदि करें।   

शनि की वस्तुओं का दान  

शनि का दान वाली वस्तुओं में  उड़द, तिल, तेल, काली गाय, काला वस्त्र, कंबल, जूता, स्वर्ण, नीलम, लोहा, आदि वस्तुओं है। यह दान प्रत्येक शनिवार के दिन किया जा सकता है।      

नोट-: किसी भी ग्रह का दान करने से पहले किसी अच्छे ज्योतिषी से अपनी कुंडली का विश्लेषण करा लेने के बाद ही  दान करना चाहिए क्योंकि कुंडली में बैठे ग्रहों के आधार पर ही जान सकते हैं की किस ग्रह का दान करना चाहिए और किस ग्रह का दान नहीं करना चाहिए।

शनि के मंत्र रत्न

शनि का रत्न  -:   नीलम  (sapphire)

शनि गायत्री मंत्र  -:  भगभवाय विद्महैं मृत्युरुपाय धीमहि तन्नो शनिः प्रचोद्यात्॥

शनि मंत्र जाप संख्या -:   23 हजार मंत्र जाप

शनि का तांत्रोक्त मंत्र   -:   प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।

शनि का वैदिक मंत्र  -:   शन्नोदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये शन्योरभिस्त्रवन्तु :

शनि का पौराणिक मंत्र -:    नीलांजन समाभासम्। रविपुत्रम यमाग्रजम्।

छाया मार्तण्डसंभूतम। तम् नमामि शनैश्चरम्।।

शनि देव की सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने के लिए तथा नकारात्मक उर्जा को कम करने के लिए उपरोक्त उपाय के साथ-साथ शनि कवचं, शनि स्तोत्र पढ़ सकते हैं, साथ ही शनि देव की आरती भी  कर सकते हैं।  

II शनि कवचं II

II अथ श्री शनिकवचम् II

अस्य श्री शनैश्चरकवचस्तोत्रमंत्रस्य कश्यप ऋषिः II

अनुष्टुप् छन्दः II शनैश्चरो देवता II शीं शक्तिः II

शूं कीलकम् II शनैश्चरप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः II

नीलाम्बरो नीलवपु: किरीटी गृध्रस्थितत्रासकरो धनुष्मान्

चतुर्भुज: सूर्यसुत: प्रसन्न: सदा मम स्याद्वरद: प्रशान्त:1

श्रृणुध्वमृषय: सर्वे शनिपीडाहरं महत्

कवचं शनिराजस्य सौरेरिदमनुत्तमम् 2

कवचं देवतावासं वज्रपंजरसंज्ञकम्

शनैश्चरप्रीतिकरं सर्वसौभाग्यदायकम् 3

ऊँ श्रीशनैश्चर: पातु भालं मे सूर्यनंदन:

नेत्रे छायात्मज: पातु कर्णो यमानुज: 4

नासां वैवस्वत: पातु मुखं मे भास्कर: सदा

स्निग्धकण्ठश्च मे कण्ठ भुजौ पातु महाभुज: 5

स्कन्धौ पातु शनिश्चैव करौ पातु शुभप्रद:

वक्ष: पातु यमभ्राता कुक्षिं पात्वसितस्थता 6

नाभिं गृहपति: पातु मन्द: पातु कटिं तथा

ऊरू ममाSन्तक: पातु यमो जानुयुगं तथा 7

पदौ मन्दगति: पातु सर्वांग पातु पिप्पल:

अंगोपांगानि सर्वाणि रक्षेन् मे सूर्यनन्दन: 8

इत्येतत् कवचं दिव्यं पठेत् सूर्यसुतस्य :

तस्य जायते पीडा प्रीतो भवन्ति सूर्यज: 9

व्ययजन्मद्वितीयस्थो मृत्युस्थानगतोSपि वा

कलत्रस्थो गतोवाSपि सुप्रीतस्तु सदा शनि: 10

अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्मद्वितीयगे

कवचं पठते नित्यं पीडा जायते क्वचित् 11

इत्येतत् कवचं दिव्यं सौरेर्यन्निर्मितं पुरा।

जन्मलग्नस्थितान्दोषान् सर्वान्नाशयते प्रभु: 12

II इति शनि कवचं संपूर्ण II

दशरथकृत शनि स्तोत्र

दशरथ उवाच:

प्रसन्नो यदि मे सौरे ! एकश्चास्तु वरः परः

रोहिणीं भेदयित्वा तु गन्तव्यं कदाचन्

सरितः सागरा यावद्यावच्चन्द्रार्कमेदिनी

याचितं तु महासौरे ! नऽन्यमिच्छाम्यहं

एवमस्तुशनिप्रोक्तं वरलब्ध्वा तु शाश्वतम्

प्राप्यैवं तु वरं राजा कृतकृत्योऽभवत्तदा

पुनरेवाऽब्रवीत्तुष्टो वरं वरम् सुव्रत

दशरथकृत शनि स्तोत्र:

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय

नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय वै नम: 1

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय

नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते 2

नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:

नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते 3

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम:

नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने 4

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय 5

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते

नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते 6

तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय

नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय वै नम: 7

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् 8

देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा:

त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत: 9

प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे

एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: 10

(इति शनि स्तोत्र: संपूर्ण)

दशरथ उवाच:

प्रसन्नो यदि मे सौरे ! वरं देहि ममेप्सितम्

अद्य प्रभृति-पिंगाक्ष ! पीडा देया कस्यचित्

श्री शनिदेव आरती

जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी

सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी

जय जय श्री शनिदेव……………

श्याम अंक वक्र दृष्ट चतुर्भुजा धारी

नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी

जय जय श्री शनिदेव…………

क्रीट मुकुट शीश रजित दिपत है लिलारी

मुक्तन की माला गले शोभित बलिहारी

जय जय श्री शनिदेव…………

मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी

लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी

जय जय श्री शनिदेव…………

देव दनुज ऋषि मुनि सुमरिन नर नारी

विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी

जय जय श्री शनिदेव…………

जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी

                          सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी  

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