मंगल नवग्रहों में से एक है। ज्योतिष शास्त्र में मंगल को क्रूर ग्रह माना गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मंगल ग्रह क्षत्रिय वर्ण का तमोगुणी तथा अग्नि तत्व प्रधान ग्रह है। मंगल ग्रह को ऊर्जा, भूमि और साहस का कारक ग्रह माना गया है। मेष और वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल ग्रह होते हैं। मंगल मकर राशि में उच्च के जबकि कर्क राशि में नीच के माने गए हैं। मंगल ग्रह का 12 भावों में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही तरह से प्रभाव देता है।
मंगल ग्रह के सकारात्मक प्रभाव
मंगल के शुभ प्रभाव से व्यक्ति निडर होता है। वह निडरता वह ऊर्जावान रहता है। इससे जातक उत्पादक क्षमता में वृद्धि होती है। विपरीत परिस्थितियों में भी जातक चुनौतियों को सहर्ष स्वीकार करता है और उन्हें मात भी देता है। बली मंगल का प्रभाव केवल व्यक्ति के ही ऊपर नहीं पड़ता है, बल्कि इसका प्रभाव व्यक्ति के पारिवारिक जीवन पर पड़ता दिखाई देता है। बली मंगल के कारण व्यक्ति के भाई-बहन अपने कार्यक्षेत्र में उन्नति करते हैं।
मंगल ग्रह के नकारात्मक प्रभाव
मंगल ग्रह का नकारात्मक प्रभाव जातक के लिए अनेक प्रकार की समस्या पैदा करता है। जिससे जातक का आत्मविश्वास और साहस का स्तर कमजोर हो जाता है, जातक को दुर्घटना का सामना करना पड़ता है। पीड़ित मंगल के कारण जातक के पारिवारिक जीवन में भी समस्याएं आती हैं, संपत्ति और जमीन के मामले में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. वैवाहिक जीवन ख़राब हो जाता है इंसान को रक्त सम्बन्धी समस्याएँ होती हैं.। जातक को शत्रुओं से पराजय, ज़मीन संबंधी विवाद, क़र्ज़ आदि समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
मंगल ग्रह की शांति के टोटके/उपाय
(1) घर आयी बहन को मीठा देकर घर से विदा करें
(2) धार्मिक स्थल पर गुड़, चने की दाल आदि का दान करें
(3) दूसरों को मीठा खिलाएँ और संभव हो तो स्वयं भी मीठा
(4) बंदरों को गुड़ और चना खिलाएं।
(5) घर में ठोस चांदी रखें।
(6) 43 दिन लगातार तंदूरी की मीठी रोटी कुत्ते को खिलाएं।
(7) अपनी वाणी पर संयम रखें, सभी से विनम्रता और प्यार से बातचीत करें।
(8) बड़ वृक्ष की जड़ में मीठा दूध-पानी डालकर उसकी गीली मिट्टी नाभि पर लगाएँ
(9) हनुमान जी की पूजा करें और हनुमान चालीसा का पाठ करें।
(10) केसरिया गणपति अपने पूजा गृह में रखें वं रोज़ उनकी पूजा करें।
मंगल की वस्तुओं का दान
मंगल का दान वाली वस्तुओं में गेहूं, मसूर, लाल, कपड़ा, गुड़ तांबा, लाल फूल, लाल चंदन, केशर, लाल बैल, भूमि, मूंगा आदि वस्तुओं है। यह दान प्रत्येक मंगलवार के दिन किया जा सकता है।
नोट-:
किसी भी ग्रह का दान करने से पहले किसी अच्छे ज्योतिषी से अपनी कुंडली का विश्लेषण करा लेने के बाद ही दान
करना चाहिए क्योंकि कुंडली में बैठे ग्रहों के आधार पर ही जान सकते हैं की किस ग्रह का दान करना चाहिए और किस ग्रह का दान नहीं करना चाहिए।
मंगल के मंत्र व रत्न
मंगल का रत्न -: मूंगा
(Coral)
मंगल गायत्री मंत्र -: ॐ अंगारकाय विद्महे शक्ति हस्ताय धीमहि, तन्नो भौमः प्रचोदयात् ॥
मंगल मंत्र जाप संख्या -: 10,000 मंत्र जाप
मंगल का तांत्रोक्त मंत्र -: ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः।
मंगल का वैदिक मंत्र -: ॐ अग्निमूर्द्धा दिव: ककुत्पति पृथिव्या
ऽअयम्। अपां रेतां सि जिन्वति भौमाय नम:।
मंगल का पौराणिक मंत्र -: धरणीगर्भसंभूतं विद्युतकान्तिसमप्रभम । कुमारं शक्तिहस्तं तं मंगलं प्रणमाम्यहम ।।
हनुमान जी को सिन्दूर चढ़ाने के लाभ
अर्पित करना और लेपन करना अत्यंत शुभ माना जाता है, सिंदूर चढ़ाने से हनुमान जी प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों पर कृपा बरसाते हैं. इसलिए मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमान जी को सिंदूर अर्पित करना चाहिए, हनुमान जी को सिंदूर अर्पित करने से ग्रह दोष दूर होते हैं. दुर्घटनाओं से रक्षा होती है और कर्ज से मुक्ति मिलती है.
मंगल ग्रह की सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने के लिए तथा नकारात्मक उर्जा को कम करने के लिए उपरोक्त उपाय के साथ-साथ मंगल कवच, व ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् पढ़ सकते हैं .साथ हीं मंगल देव की आरती भी कर सकते हैं।
अथ मंगल कवचम्
अस्य श्री मंगलकवचस्तोत्रमंत्रस्य कश्यप ऋषिः ।
अनुष्टुप् छन्दः । अङ्गारको देवता । भौम पीडापरिहारार्थं जपे विनियोगः।
रक्तांबरो रक्तवपुः किरीटी चतुर्भुजो मेषगमो गदाभृत् ।
धरासुतः शक्तिधरश्च शूली सदा ममस्याद्वरदः प्रशांतः ॥ 1॥
अंगारकः शिरो रक्षेन्मुखं वै धरणीसुतः ।
श्रवौ रक्तांबरः पातु नेत्रे मे रक्तलोचनः ॥ 2 ॥
नासां शक्तिधरः पातु मुखं मे रक्तलोचनः ।
भुजौ मे रक्तमाली च हस्तौ शक्तिधरस्तथा ॥ 3॥
वक्षः पातु वरांगश्च हृदयं पातु लोहितः।
कटिं मे ग्रहराजश्च मुखं चैव धरासुतः ॥ 4॥
जानुजंघे कुजः पातु पादौ भक्तप्रियः सदा ।
सर्वण्यन्यानि चांगानि रक्षेन्मे मेषवाहनः ॥ 5 ॥
या इदं कवचं दिव्यं सर्वशत्रु निवारणम् ।
भूतप्रेतपिशाचानां नाशनं सर्व सिद्धिदम् ॥ 6 ॥
सर्वरोगहरं चैव सर्वसंपत्प्रदं शुभम् ।
भुक्तिमुक्तिप्रदं नृणां सर्वसौभाग्यवर्धनम् ॥
रोगबंधविमोक्षं च सत्यमेतन्न संशयः ॥ 7॥
॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे मंगलकवचं संपूर्णं ॥
।। ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् ।।
मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः ।
स्थिरासनो महाकयः सर्वकर्मविरोधकः ॥1।।
लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः ।
धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः॥2।।
अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः ।
व्रुष्टेः कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः॥3।।
एतानि कुजनामनि नित्यं यः श्रद्धया पठेत् ।
ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात् ॥4।।
धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम् ।
कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम् ॥5।।
स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः ।
न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित् ॥6।।
अङ्गारक महाभाग भगवन्भक्तवत्सल ।
त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय ॥7।।
ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये ह्यपमृत्यवः ।
भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ॥8।।
अतिवक्त्र दुरारार्ध्य भोगमुक्त जितात्मनः ।
तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुश्टो हरसि तत्ख्शणात् ॥9।।
विरिंचिशक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा ।
तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः ॥10।।
पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गतः ।
ऋणदारिद्रयदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः ॥11।।
एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम् ।
महतिं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा ॥12।।
।। इति श्री ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् सम्पूर्णम्।।
मंगल वार की पावन आरती
मंगल मूरति जय जय हनुमंता, मंगल-मंगल देव अनंता।
हाथ व्रज और ध्वजा विराजे, कांधे मूंज जनेऊ साजे।
शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जगवंदन।
लाल लंगोट लाल दोऊ नयना, पर्वत सम फारत है सेना।
काल अकाल जुद्ध किलकारी, देश उजारत क्रुद्ध अपारी।
रामदूत अतुलित बलधामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा।
महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी।
भूमि पुत्र कंचन बरसावे, राजपाट पुर देश दिवावे।
शत्रुन काट-काट महिं डारे, बंधन व्याधि विपत्ति निवारे।
आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हांक ते कांपै।
सब सुख लहैं तुम्हारी शरणा, तुम रक्षक काहू को डरना।
तुम्हरे भजन सकल संसारा, दया करो सुख दृष्टि अपारा।
रामदण्ड कालहु को दण्डा, तुम्हरे परसि होत जब खण्डा।
पवन पुत्र धरती के पूता, दोऊ मिल काज करो अवधूता।
हर प्राणी शरणागत आए, चरण कमल में शीश नवाए।
रोग शोक बहु विपत्ति घराने, दुख दरिद्र बंधन प्रकटाने।
तुम तज और न मेटनहारा, दोऊ तुम हो महावीर अपारा।
दारिद्र दहन ऋण त्रासा, करो रोग दुख स्वप्न विनाशा।
शत्रुन करो चरन के चेरे, तुम स्वामी हम सेवक तेरे।
विपति हरन मंगल देवा, अंगीकार करो यह सेवा।
मुद्रित भक्त विनती यह मोरी, देऊ महाधन लाख करोरी।
श्रीमंगलजी की आरती हनुमत सहितासु गाई।
होई मनोरथ सिद्ध जब अंत विष्णुपुर जाई।